Friday, April 3, 2020
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नहर में पानी नहीं होने से पटवन व मछली पालन पर संकट

#Begusarai जिले की पश्चिमी सीमा पर स्थित गोयला चौर से गुजरने वाली सुल्ताना बाहा पिछले कई वर्षों से पानी के अभाव में लुप्त होने के कगार पर है। एक जमाना था जब सुल्ताना बाहा में सालोंभर नाव चलती थी। इस नहर से फतेहा, चिरंजीवीपुर व रसीदपुर पंचायतों के गोयला चौर के हजारों हेक्टेयर खेतों में लगी फसलों का पटवन करने में किसानों को सहूलियत होती थी। क्षेत्र के मछुआरों के लिए सुल्ताना बाहा मछली पालन का केंद्र बना था।

कई बुजुर्ग ग्रामीणों ने बताया कि सुल्ताना बाहा इस इलाके में सैकड़ों साल पुरानी नहर है। दशकों पूर्व मुजफ्फरपुर, वैशाली व समस्तीपुर जिले की गंडक, बलान व गंगा बाया नदियों में बरसात के दिनों तटबंधों पर पानी का दबाव बढ़ने पर इन नदियों का पानी सुल्ताना बाहा में छोड़ा जाता था। उस समय पूरा गोयला चौर जलमग्न रहता था। बरसात के दिनों सुल्ताना बाहा के पानी का दबाव एनएच 28 पर बना रहता था। लिहाजा एनएच 28 पर पुल बनाकर चिरंजीवीपुर के पास इस नहर को बलान नदी से जोड़ा गया। गोयला चौर में सुल्ताना बाहा लबालब हो जाने पर चिरंजीवीपुर के पास बने सलुईश गेट के जरिए इस नहर का पानी बलान नदी में छोड़ा जाता था।

सालों भर नहर में पानी रहने से किसानों को खेतीबाड़ी करने के साथ-साथ आसपास के कई गांवों के लोग यहां मछली व्यापार के धंधे से जुड़े थे। यहां की मछली की मांग दलसिंहसराय व समस्तीपुर मंडी में सर्वाधिक रहती थी। सुल्ताना बाहा से प्रतिदिन करीब 10 क्विंटल मछली दूरदराज के शहरों में निर्यात किए जाते थे। ग्रामीणों ने बताया कि पिछले करीब 10 वर्षो से सुल्ताना बाहा पानी के अभाव में अपनी पहचान खोने के कगार पर है।लोगों ने बतायी समस्या सुल्ताना बाहा क्षेत्र के हजारों परिवार के लिए वर्षों तक रोजी-रोटी का जरिया बना रहा। पिछले कई वर्षों से इस नहर के सूख जाने से मत्स्यजीवी परिवारों के समक्ष जीविकोपार्जन करने की समस्या उत्पन्न हो गई है।

रामबालक साहनी, सदस्य, मत्स्यजीवी सहयोग समिति, रसीदपुरमछली व्यापार ठप हो जाने से परिजनों को परदेस में रहकर मजदूरी करना पड़ रहा है। गांव का रोजगार खत्म हो चुका है, कोई देखने वाला नहीं है। शांति देवी, सदस्य, मत्स्यजीवी सहयोग समितिसरकार सुल्ताना नाला में सालों भर पानी की व्यवस्था करे। गोयला चौर में किसानों को पटवन की समस्या से छुटकारा मिलेगी। सुमन देवी, सदस्य, मत्स्यजीवी समितिसुल्ताना बाहा का अस्तित्व मिटने से रसीदपुर, चिरंजीवीपुर, फतेहा समेत कई गांवों के युवाओं का रोजगार की तलाश में गांव से पलायन हो चुका है। सरकार पानी संरक्षण की बात करती है किंतु यहां सरजमीं पर कोई सुधि नहीं ले रहे हैं।रविंद्र चौधरी, ग्रामीण, रसीदपुरसुल्ताना बाहा कभी मछली उत्पादन के क्षेत्र में बेगूसराय व समस्तीपुर जिले में अपना नाम रखता था।

अधिकारियों व जनप्रतिनिधियों की उपेक्षा के कारण आज यह नहर पहचान खोने पर है।मो. मुन्ना, ग्रामीण, रसीदपुरकई बार विभागीय अधिकारियों को इस नहर की दुर्दशा के बारे में शिकायत की गई किंतु किसी ने अब तक कोई सकारात्मक पहल नहीं की है। मो. कैसर, ग्रामीण, रसीदपुरअतिक्रमण से दो नाले का हुआ अस्तित्व समाप्तहाल खनुआ और कठौतिया नाला काइसी नाले से बलान के पानी का चौर में होता था प्रवेशबलान नदी में गाद जमा होने से नाला में पानी का प्रवाह हुआ बाधितभगवानपुर। निज संवाददाताबलान नदी का पानी बरसात के मौसम चौर में जाने व खेतों में सिंचाई के लिए बना खनुआ व कठौतिया नाला अब मृतप्राय हो गया है। इस कारण किसानों ने इन दोनों नालों को अतिक्रमित कर खेत बना लिया है।

पहले इन दोनों नालों से चौर का पानी नदी में जाता था। पहले नदी का पानी चौर में जाता था। इससे किसानों को खेतों की सिंचाई करने सहूलियत होती थी। बहियार में जलजमाव की समस्या भी नहीं रहती थी। रबी की खेती के समय चौर का पानी नदी में गिर जाता था। खनुआ नाला मोख्तियारपुर से होते हुए चंदौर, मेहदौली, भगवानपुर, दहिया चौर होते हुए धुसहा में बलान नदी से मिल जाता था। वहीं, कठौतिया नाला पाली से शुरू होकर पासोपुर, कटहरिया होते हुए मुसवारा बांध के समीप बलान नदी से मिलता था। इसका प्रवाह कौआ टाल होते हुए आगे तक चला गया है। कालांतर में बलान नदी में गाद भर जाने व नाला को अतिक्रमित किये जाने के कारण अब पानी का प्रवाह रुक गया है।

बताया गया है कि नाला के बगल वाले खेत के मालिकों ने नाला को भर कर अतिक्रमित कर अपना कब्जा कर खेत बना लिया है। प्रखंड में बलान व बैंती नदी बहती है। पहले सालों भर इन नदियों में पानी प्रवाहित होता था। नदी की तलहटी में गाद जमा होने से दोनों नदियां बरसाती नदी बन कर रह गई हैं। वर्तमान में उत्तर बिहार की प्रायः नदियों में बाढ़ की समस्या उत्पन्न होती है लेकिन बलान व बैंती नदी अब भी सूखी है। इन नदियों की तलहटी से गाद निकालकर जलसंचय की व्यवस्था किए जाने से किसानों को पटवन की समुचित सुविधा मिल सकेगी।

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