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जेएनयू चुनाव : वाम एकता किसी तरह बची एबीवीपी सबसे बड़ी संघटन के रूप में उभरी !!

जवाहरलाल नेहरू यूनवर्सिटी छात्र संघ का चुनाव सम्पन्न हुआ और चुनाव का परिणाम काफी दिलचस्प रहा। जहाँ लेफ्ट को अपनी कमजोरी पता था जिसके मजबूरन अपने तीन संगठन मिलकर चुनाव लड़ना पड़ा। एबीवीपी की अपना समर्थन साल दर साल बढ़ रहा है ,बापसा अपने तीन साल के यात्रा में काफी धूम से आगे बढ़ रही हैं। एआईएसएफ की हालत तो ऐसी होती जा रही है जो निर्दलीय उम्मीदवार से भी कम समर्थन जुटा पाई।

सबसे पहले बात लेफ्ट यूनिटी की जेएनयू को बामपंथ का दुर्ग कहा जाता है लेकिन ये काफी जल्दी के साथ बदल रहा है। पहले जहाँ यहाँ चुनाव वामपंथी विचारो की बीच होती थी। आज वाम एकता भी संघर्ष करते हुए दीखता है। साल दर साल उनका समर्थन कम होते जा रहा है जहाँ वो पहले आपस में लड़ कर भी जितने वोट से जीतते थे आज उतना वोट पूरी वाम एकता को मिलता भी नहीं है। जहाँ कभी वामपंथी धारा के एक विचार अपने धारा के दूसरे विचार को 1600 वोट हराता था वहाँ अब पिछले साल पुरे वाम एकता के उम्मीदवार मोहित पांडेय को 1954 वोट मिले और इस बार के उम्मीदवार गीता कुमारी को उससे भी कम 1506 वोट मिले हैं।

अब बात एबीवीपी की जो साल दर साल अपने को मजबूत करते आ रहे हैं। पहले जेएनयू के चुनाव में इनका कोई महत्व नहीं होता था अब सब से बड़ी संघठन के रूप में उभरी है। इस साल के चुनाव में भी एबीवीपी ने अपना भगवा झंडे की वोट बरकरार रखा है जहाँ वो पिछली उनके अध्यक्ष पद के उम्मीदवार जहान्वी 1048 वोट के साथ तीसरी स्थान पर रही वहीं इस वार के उम्मीदवार निधि त्रिपाठी 1042 वोट के साथ दूसरे स्थान पर पहुँच चुकी हैं साथ ही पिछले वार जहाँ एबीवीपी का सिर्फ 1 कॉउंसलर था इस बार उसकी संख्या 12 पर पहुँच चुकी है।

बापसा जेएनयू का सबसे तेजी से उभरी हुई संघटन है। पिछले तीन साल में उनका विकास धमाकेदार रहा है। जहाँ तक इस साल की चुनाव की बात है उनका प्रदर्शन पिछले साल से कमजोर रहा फिर भी वो एक नई संघटन के रूप काफी अच्छा प्रदर्शन कर रही है। जहाँ पिछले साल उनके अध्यक्ष पद के उम्मीदवार एस. राहुल 1545 वोट के साथ दूसरे स्थान पर थे इस बार के उम्मीदवार शबाना अली को 945 वोट मिले।

वही सब से खराब प्रदर्शन एआईएसएफ का रहा कभी उनका अध्यक्ष रहा करता था अब उनका हालत ये है उनको निर्दलीय उम्मीदवार से भी कम वोट मिले। इस साल एआईएसएफ के अध्यक्ष पद के उम्मीदवार महसूर नेता डी राजा की बेटी अपराजिता राजा थी जिनको निर्दलीय उम्मीदवार फकरूदीन आलम से 3 वोट कम सिर्फ 416 वोट ही मिलें।

एनएसयूआई का हर साल की तरह इस साल भी रहा उनके उम्मीदवार वृष्‍णिका सिंह को सिर्फ 82 वोट मिले जबकि नोटा को 127 वोट मिला।

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